पोप लियोः पवित्रता सबों का बुलावा है
पोप लियो ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा माला में पवित्रता हेतु विश्वासियों की वैश्विक बुलाहट पर चिंतन करते हुए कहा कि यह हर ख्रीस्तीय की बुलाहट है।
पोप लियो 14वें अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात और सुस्वागतम्।
द्वितीय वाटिकन महासभा का कलीसियाई धर्मसिद्धांत, लुमेन जेन्सियुम का पूरा पाँचवाँ अध्याय पवित्रता हेतु विश्वासियों की वैश्विक बुलाहट को समर्पित है। हममें से हर कोई ईश्वर की कृपा में जीवनयापना करने, ईश्वरीय गुणों का अभ्यास करते हुए ख्रीस्त का अनुसरण करने को बुलाये गये हैं। धर्मसभा के धर्मसिद्धांत अनुसार, पवित्रता कुछेक विशेष लोगों के लिए नहीं है, बल्कि यह एक उपहार है जो सभी बपतिस्मा प्राप्त लोगों को सर्वश्रेष्ठ प्रेममय जीवन में अपने को पोषित करने का आहृवान करती है, अर्थात हम अपने जीवन को ईश्वर और अपने पड़ोसी के लिए पूर्णत में जीने के लिए बुलाये गये हैं।
प्रेम में जीवन की बुलाहट
प्रेम, वास्तव में, पवित्रता का केन्द्र विन्दु है जिसके लिए हम सब विश्वासी बुलाये गये हैं। पिता ईश्वर की ओर से, पुत्र में दिया गया यह गुण, “पवित्रता प्राप्त करने के सभी गुणों से ऊपर है, और यह उन सभी गुणों को पोषित करता है।” (लुमेन 42)। शहादत पवित्रता की चरम बिन्दु हैं, जैसे कि यह प्राचीन काल की कलीसिया में थी,“विश्वास और प्रेम का सबसे बड़ा साक्ष्य” (50), यही कारण है कि धर्मसिद्धांत के लेख हमें इस बात की शिक्षा देते हैं कि हर विश्वासी को चाहिए कि वह लोहू बहाने की परिस्थिति तक ख्रीस्त में अपने विश्वास का साक्ष्य दे, जैसे कि यह अतीत में था और जिसे हम आज भी पाते हैं। साक्ष्य के इस तत्परता की अनुभूति हममें हर बार तब होती है जब हर समय में ख्रीस्तीय, न्याय के लिए अपने को समर्पित करते हुए, विश्वास और प्रेम की निशान छोड़ते हैं।
ख्रीस्त शीर्ष और चरवाहे
पोप ने कहा कि सभी संस्कार, और विशेषकर यूखारीस्त, हमें एक पवित्र जीवन के लिए पोषित करते हैं, वे हममें से हर किसी को ख्रीस्त के निकट लाते हैं, जो हमारे लिए आदर्श और पवित्रता की चरम है। वे कलीसिया को परिशुद्ध करते हैं, जिसके वे स्वयं शीर्ष और चरवाहे हैं। इस संदर्भ में पवित्रता, उनका उपहार है जो हमारे प्रतिदिन के जीवन में, हर क्षण में परिलक्ष्ति होता है जब हम उन्हें आनंद में ग्रहण करते और उनका प्रत्युत्तर निष्ठा में देते हैं। इसके बारे में संत पापा पॉल 6वें ने, कलीसिया की याद करते हुए, जहाँ वह अपने सब बपतिस्मा प्राप्तों में सत्य हेतु बुलाई गई है, अपने आमदर्शन समारोह 20 अक्टूबर 1965 में कहा, “आप पवित्र हों, अर्थात सच्चे रुप में योग्य, उनकी संतान के रूप में मजबूत और विश्वासी”। यह हमारे आंतरिक परिवर्तन में अनुभव किया जाता है, जहाँ हर एक व्यक्ति का जीवन पवित्र आत्मा के द्वारा येसु ख्रीस्त के गुणों में सुदृढ़ता को प्राप्त करता है।
कलीसियाः दिव्य उपहारों की सुदृढ़ता
पोप ने कहा कि लुमेन जेन्सियुम कलीसिया की पवित्रता को उसकी एक संवैधानिक विशेषताओं के रूप में परिभाषित करता है, क्योंकि वह अपने में “अविभाज्य रूप से पवित्र” मानी जाती है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने में एक पूर्ण और सर्वश्रेष्ठ है, बल्कि उसका बुलाया दिव्य लक्ष्य की ओर अग्रसर होने हेतु, अपनी इस तीर्थयात्रा में दिव्य उपहारों से सुदृढ़ता प्रदान करना है,“जहाँ हम दुनिया की सतावटों और ईश्वर के सांत्वनाओं” को पाते हैं। कलीसिया में पाप की दुःखद सच्चाई, अर्थात जो हम सभों में हैं, हर व्यक्ति को अपने में एक गंभीर परिवर्तन लाने का निमंत्रण देती है, जहाँ हम अपने को ईश्वर के लिए समर्पित करते हैं, जो प्रेम से हमें नवीन बनाते हैं। मुख्यतः इस दिव्य कृपा के कारण जो कलीसिया को परिशुद्ध करती है, जहाँ से हम इसे एक प्रेरिताई के रूप में प्राप्त करते हैं उसे अपने प्रति दिन के जीवन में पूरा करने को कहे जाते हैं- जो हमारे लिए स्वयं में परिवर्तन है। अतः, पवित्रता सिर्फ अपने में एक व्यावहारिक प्रकृति नहीं है, मानो यह एक नैतिक उत्तरदायित्व तक सीमित हो, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों हो, बल्कि यह व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों रूपों में ख्रीस्तीय जीवन का सार है।