यूनेस्को में पोप: जीवन एक उपहार है, कोई चीज़ या सामान नहीं

पेरिस की अपनी प्रेरितिक यात्रा के दौरान संत पापा का दूसरा पड़ाव संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को के मुख्यालय था। पोप ने इस दौर की तानाशाही या बर्बरता, साथ ही इंसान के "अमानवीयकरण" और मशीनों के "मानवीयकरण" की निंदा की। उन्होंने कहा कि "गर्भ में पल रहे बच्चों और युद्धग्रस्त इलाकों में रहने वाले बच्चों, शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम लोगों, बुज़ुर्गों और प्रवासियों" का ध्यान रखना ही इंसानी गरिमा के सम्मान से जुड़े कामों और बयानों की असल कसौटी है।

पोप लियो 14वें फ्रांस की अपनी चार दिवसीय यात्रा के पहले पड़ाव पेरिस में फ्रांस के अधिकारियों, नागर अधिकारियों से मुलाकात करने के बाद  संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को के मुख्यालय का दौरा किया।

पोप ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रतिनिधियों को अपने संबोधन में कहा, “मुझे आज इस अंतरराष्ट्रीय सभा में आपके साथ शामिल होकर खुशी हो रही है, जहाँ भाषाएँ और संस्कृतियाँ मिलकर पूरे मानव परिवार के लिए बहुत महत्वपूर्ण काम में सहयोग करती हैं: “शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के ज़रिए देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देकर शांति और सुरक्षा में योगदान देना, ताकि न्याय, कानून के शासन और... मानवाधिकारों व बुनियादी आज़ादी के लिए सार्वभौमिक सम्मान को और बढ़ाया जा सके।” एक न्यायपूर्ण दुनिया बनाने की कोशिश ही असल में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आधार है। हम अपने अनुभव, कौशल और विशेषज्ञता को साझा करते हैं ताकि ऐसा माहौल बनाया जा सके जिसमें हर कोई अपनापन महसूस करे और हर व्यक्ति तरक्की कर सके, ताकि हर जगह लोग शांति से रह सकें और खुशहाल हो सकें।

पोप ने संगठन के महानिदेशक, श्री खालिद अल-एनानी को उनके स्नेहपूर्ण बातों के लिए धन्यवाद दिया और शांति के एक गवाह के तौर वहाँ उपस्थित सभी का स्वागत किया। संत पापा ने कहा कि वे एक चरवाहे के रूप में कलीसिया की ओर से यह बताने आये हैं कि कलीसिया हमेशा बातचीत की कोशिश करती है और हर व्यक्ति, और नेक नीयत वाले सभी स्त्री-पुरुषों तक अपना संदेश पहुँचाना चाहती है।

न्यायपूर्ण दुनिया बनाने का संकल्प
पोप ने कहा कि एक न्यायपूर्ण दुनिया बनाने का संकल्प उस मिशन का हिस्सा है जिसे हमने इतिहास के दौरान साझा करना सीखा है। आज के समय में, यूनेस्को हमारे काम के अलग-अलग क्षेत्रों के हिसाब से, उस प्रतिबद्धता को और ज़्यादा मज़बूती से पूरा करने का एक लक्ष्य और ज़रिया, दोनों है। साल 2027 में यूनेस्को में 'परमधर्मपीठ’ के स्थायी पर्यवेक्षक मिशन के 75 साल पूरे होंगे। यह इस भरोसे पर टिकी है कि भविष्य सबसे पहले इस बात पर निर्भर करता है कि ईश्वर के स्वरूप में रचे गए हर पुरुष और महिला की जन्मजात गरिमा का सम्मान किया जाए और उसे बढ़ावा दिया जाए। 1952 से, 'परमधर्मपीठ’ के स्थायी पर्यवेक्षक मिशन इसी नज़रिए से यूनेस्को की पहलों की समीक्षा करता रहा है और उनमें सहयोग देता रहा है, साथ ही देशों के बीच बातचीत में अपना खास योगदान भी देता रहा है। ऐसा उसने सच्चे मानवीय विकास को बढ़ावा देने के मकसद से किया है—और विकास सच्चा तभी होता है जब वह "हर इंसान और पूरे इंसान के विकास" को बढ़ावा देने की दिशा में हो।

परमधर्मपीठ की प्रतिबद्धता
पोप ने याद किया कि 46 साल पहले इस सभा को संबोधित करते हुए, संत जॉन पॉल द्वितीय ने कहा था कि मानव जाति कला और तर्क के माध्यम से जीती है। नतीजतन, "संस्कृति की बदौलत ही मनुष्य वास्तव में मानवीय जीवन जीता है।" 'संस्कृति' शब्द का अर्थ ही उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा मानवता अपनी सभी गतिविधियों को अर्थ प्रदान करती है। संत पापा ने कहा कि वे परमधर्मपीठ की प्रतिबद्धता को दोहरा रहे हैं। वे यूनेस्को को न केवल एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, बल्कि एक ऐसी जगह के रूप में भी देखने के लिए कहते हैं जहाँ मानवता स्वयं पर, अपने इतिहास और अपने भविष्य पर चिंतन कर सकती है। सच तो यह है कि शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति को बढ़ावा देना तब तक मुमकिन नहीं है, जब तक कि इन कामों में लगे पुरुषों और महिलाओं के जीवन को बेहतर न बनाया जाए।

पोप ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में, काथलिक कलीसिया एक पुरानी परंपरा का उत्तराधिकारी है। सदियों से, इसके समुदायों ने स्कूल और विश्वविद्यालय स्थापित किए हैं, लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाया है, और सबसे गरीब और दूर-दराज के इलाकों में भी अपनी मौजूदगी बनाए रखी है।

शिक्षा पर वैश्विक समझौता, के ज़रिए, पोप फ्राँसिस ने इस अनुभव को शिक्षा से जुड़े एक व्यापक समझौते का हिस्सा बनाने की कोशिश की, जिसमें सभी का योगदान शामिल हो सके। संत पापा लियो ने उस सोच या विश्वास के बारे में कहा, जिससे ये प्रयास उपजते हैं। कोई भी शिक्षा तब तक पूरी नहीं मानी जा सकती जब तक वह जीवन के अर्थ से जुड़े सवाल का जवाब न दे।

पोप ने कहा कि इस सभा में एक बुनियादी सवाल पर गौर करना ज़रूरी है, जिसका जवाब मिलना बहुत ज़रूरी है: इंसान होने का क्या मतलब है? हर संस्कृति के सामने यह सवाल आता है, और यह सवाल हर तरह की जानकारी, हर कला और हर धर्म के केंद्र में है। आखिर, इक्कीसवीं सदी में भी हम यह मानकर नहीं चल सकते कि हम जानते हैं कि इंसान कौन है या इंसान के तौर पर जीने का क्या मतलब है। असल में, हर पीढ़ी को इस सवाल से जूझना पड़ता है, खासकर उन त्रासदियों के समय, जो अफ़सोस की बात है कि आज भी होती रहती हैं।

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