पोप लियोः विश्वास संस्कृतियों को समृद्ध बनाती है

पोप लियो 14वें ने वाटिकन द्वितीय महासभा के धर्मसिद्धांत, गौदियुम एत स्पेस पर अपनी धर्मशिक्षा माला देते हुए इस बात की ओर ध्यान आकर्षित कराया की कलीसिया संस्कृति को प्रोत्साहित करने को बुलाई गयी है।

पोप लियो 14वें ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन के संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा,

प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात और सुस्वागतम।

वाटिकन द्वितीय महासभा ख्रीस्तीय विश्वास से संबंधित संस्कृति की विषयवस्तु के बारे में चर्चा करने से नहीं चूकती है। हम इसे गौदियुम एत स्पेस के द्वितीय अध्याय के दूसरे भाग में पाते हैं।

काथलिक कलीसिया ने हमेशा से इस बात पर ध्यान दिया है कि सुसमाचार प्रचार के साथ-साथ हर तरह के शिक्षण संस्थानों की स्थापना की जाये, जिसका उद्देश्य पांचों महाद्वीपों के नर और नारियों में मानवीय,  सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा मिले। मध्यकालीन विश्वविद्यालयों की उत्पत्ति, जैसे कि हम जानते हैं, कलीसिया के हृदय से हुई, जिनके द्वारा पश्चिमी सभ्यता के विकास में एक बड़ा योगदान मिला। इसके साथ ही, संस्कृति और ज्ञान के विकास ने सदैव नये और गंम्भीर सवालों को उठा, जिसके कारण विश्वासियों को अपने विश्वास के कारण को जानने में मदद मिली। अंततः, मानवीय आध्यात्मिक आयाम की अभिव्यक्ति के द्वारा विभिन्न संस्कृति के प्रकटीकरण ने मानव के मतिष्क में सदैव उठने वाले सवालों, दुनिया और मानव जीवन के अस्तित्व को जानने में मदद मिली, इस भांति लोग येसु ख्रीस्त के सुसमाचार को ग्रहण करने हेतु तैयार हुए।

विश्वास की सत्यता, संस्कृति का अंग
पोप लियो ने कहा कि विश्वास और संस्कृति के मध्य संबंध को हम देहधारण में मुख्य रुप से आधारित पाते हैं- यदि दिव्य वचन ने शरीरधारण किया और हमारे बीच निवास करने का चुना किया, (यो.1.14) तो विश्वास को भी हम एक ठोस सच्चाई के रुप में पाते हैं, जो संस्कृति से गुंथी हुई है जिसमें वह गहराई से जुड़ी है। यह संस्कृति बनने हेतु बुलायी जाती है, अर्थात लोगों के जीवन की सजीव परिस्थिति का अंग बनने के लिए जहाँ वे रहते हैं, मानव के शब्दों, परंपरा, धार्मिक अर्थ, कला और कविता, विचार और विज्ञान का अंग बनने को कही जाती है। जैसे कि संत पापा जोन पौल द्वितीय ने प्रेमपूर्ण ढ़ंग से इसे घोषित किया,“एक विश्वास जो संस्कृति नहीं बनती तो वह पूर्णरूपेण आलिंगन नहीं की जाती है, उसके बारे में पूरी तरह विचार नहीं किया जाता, उसे निष्ठा में पूर्णरूपेण नहीं जीया जाता।”

विश्वास का आलिंगन
पोप लियो ने कहा कि विश्वास को सभी संस्कृतियों में आलिंगन किया जा सकता है, क्योंकि यह अपने को किसी के संग विशेष रुप से स्थापित नहीं करता है। यह उनके अंदर रहता, उन्हें आंतरिक रुप में आकार प्रदान करता है जैसे कि हम उसे येसु ख्रीस्त के “स्वरूप” में पाते हैं, अर्थात करूणा, सेवा और ईश्वर को पितृत्व पहचान के रुप में। इस भांति,कलीसिया उन सारी संस्कृतियों से उन सारी चीजों ग्रहण करती है जो अच्छी,सुन्दर और सच्ची हैं, जिससे वह सुसमाचार के संदेश को अपना बनाते हुए उसे प्रसारित कर सके। वहीं, “कलीसिया, हर समय और हर स्थान के सभी लोगों के लिए भेजी जाती है, यह अपने को किसी विशेष जाति और देश के लिए सीमित नहीं करती है, यह किसी एक खास जीवन वर्तमान या अतीत की परंपरा को प्रोत्साहन नहीं देती है। वह अपनी परंपरा के प्रति निष्ठावान और साथ ही वैश्विक प्रेरिताई के प्रति सजग रहती है, वह विभिन्न सभ्यताओं के संग एकतापूर्ण संबंध में प्रवेश कर सकती है, जो उन्हें और कलीसिया को पारस्परिक रूप में समृद्ध बनाती है।”  

कलीसिया की बुलाहट संस्कृति को प्रोत्साहित देना
पोप ने कहा, “कलीसिया संस्कृति को बढ़ावा देती है क्योंकि यह अपने में एक अच्छाई है, यह मानवता की एक सेवा और पृथ्वी पर उसके बुलाहट की परिपूर्णतः है। यही कारण है कि गौदियुम एत स्पेस अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस बात की सुनिश्चितता प्रदान करने का आहृवान करती है कि हर किसी को मूलभूत सांस्कृतिक चीजों का अधिकार मिले, जिससे वे निरक्षरता और शिक्षा की कमी पर जीत हासिल करें। वे सभी जो उच्च शिक्षा प्राप्त करने की योग्यता रखते हैं- वाटिकन महासभा इस बात को सुदृढ़ता से घोषित करती है- उन्हें एक ऐसा परिस्थिति में रखा जाये कि वे इसे व्यावहारिक रुप में पूरा कर सकें। उससे भी बढ़कर, “हर किसी से इस बात की मांग की जाती है कि वे सांस्कृतिक जीवन में महिलाओं की उचित और आवश्यक भागीदारी को स्वीकारने और उसे बढ़ावा देना की जिम्मेदारी लें।”

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