शांति युद्ध की अनुपस्थिति नहीं बल्कि न्याय का कार्य है
शिकागो के महाधर्माध्यक्ष कार्डिनल ब्लेज़ जे. क्यूपिख को अमरीकी काथलिक ईशशास्त्रीय संघ द्वारा ब्लेसड आर द पीसमेकर्स पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
संयुक्त राज्य अमरीका में शिकागो के महाधर्माध्यक्ष कार्डिनल ब्लेज़ जे. क्यूपिख को बुधवार को अमरीकी काथलिक ईशशास्त्रीय संघ द्वारा ब्लेसड आर द पीसमेकर्स अर्थात् धन्य हैं शांति का निर्माण करनेवाले नामक पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
न्यायसंगत युद्ध की तर्कणा
पुरस्कार समारोह में बोलते हुए कार्डिनल ब्लेज़ जे. क्यूपिख ने चेतावनी दी है कि “स्क्रीन के ज़रिए होने वाले झगड़े” मानव जीवन को “मनुष्यों के बजाय डाटा पॉइंट्स” तक कम कर सकते हैं। इस वर्ष खजूर इतवार के दिन किये सन्त पापा लियो 14 वें के प्रवचन का उल्लेख कर उन्होंने कहा कि प्रभु येसु ख्रीस्त “युद्ध करने वालों की प्रार्थना नहीं सुनते, बल्कि उनका बहिष्कार कर देते हैं।”
कार्डिनल महोदय ने इस बात पर गहन दुख व्यक्त किया इन दिनों बहुत से लोग न्यायसंगत युद्ध के सिद्धान्त पर ज़ोर दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा करना “नैतिक विवेक की तरह कम और यह साबित करने के लिए एक उत्सुक प्रयास की तरह अधिक प्रतीत होने लगा है कि जो हो रहा है वह अभी भी न्यायसंगत हो सकता है।”
कार्डिनल क्यूपिख ने कहा कि युध्द को न्यायिक ठहराने वाला तरीका “गलत शुरुआत है”। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हमें जो पहला सवाल पूछना चाहिए, वह यह नहीं कि “क्या इस युद्ध को सही ठहराया जा सकता है?” बल्कि यह है कि “सुसमाचार हमसे क्या चाहता है? वास्तव में, शांति निर्माता बनने का क्या मतलब है?”।
शांति, रचनात्मकता, संवेदनशीलता, कौशल
कार्डिनल क्यूपिख ने शांति निर्माण के लिए सन्त पापा फ्राँसिस के प्रेरितिक उद्बोधन गाओदाते एत एज़ुलताते से ली गई चार शर्तों को याद दिलाया जो हैं: शांति, रचनात्मकता, संवेदनशीलता और कौशल।
उन्होंने कहा कि सेरेनिटी अर्थात् शांति ज़रूरी है, “इसलिए नहीं कि शांति झगड़े को नज़रअंदाज़ करती है, बल्कि इसलिए कि वह उससे स्वतः को शासित होने से मना करती है… प्रभुत्व और अपमान की तर्कणा के भीतर जवाब देने के बजाय शिष्य उस तर्कणा से पूरी तरह बाहर निकल जाता है।”
दूसरी ओर रचनात्मकता ज़रूरी है क्योंकि “संघर्ष को आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता; इसे रूपान्तरित करना होगा।” वस्तुतः, इसका मतलब है “सम्वाद और समझौते के लिये धैर्यवान एवं कड़ी मेहनत है, किसी भी कीमत पर समझौते हासिल करने के तौर पर नहीं, बल्कि न्याय की ओर ले जाने वाले नैतिक तरीकों के तौर पर।”
संवेदनशीलता का अर्थ समझाते हुए कार्डिनल क्यूपिख ने कहा, “व्यक्तियों पर ध्यान देना विशेषकर मुश्किल व्यक्ति पर।” उन्होंने कहा कि मानव सम्मान के बारे में “अमूर्त रूप में” बात करना आसान है, लेकिन “उन लोगों में इसे पहचानना बहुत मुश्किल है जो हमें उकसाते हैं, हमारा विरोध करते हैं, या हमें चोट पहुँचाते हैं।” फिर भी, यह याद रखना होगा कि ठीक इसी काम के लिए सुसमाचार हमसे मांग करता है।
“गेमिफिकेशन” की निन्दा
उन्होंने कहा कि सर्वत्र युद्ध के बढ़ते “गेमिफिकेशन” के कारण संवेदनशीलता और भी मुश्किल होती जा रही है: “पर्दों के जरिये मध्यस्थता किए गए संघर्ष, छवियों, माप-तौल और रणनीतिक अमूर्तता तक सिमट जाते हैं, जहाँ मानव जीवन को व्यक्तियों के बजाय डाटा पॉइंट्स के तौर पर देखे जाने का खतरा रहता है।”
अन्त में, कौशल के बारे में चर्चा करते हुए कार्डिनल क्यूपिख ने कहाः हम प्रायः शांति को एक "आकांक्षा या भावना" के तौर पर देखते हैं, लेकिन सन्त पापा फ्राँसिस इसे एक कला कहते हैं, जिसे सीखा जाना, व्यवहार में लाना और बेहतर बनाया जाना चाहिये। इसके लिए, उन्होंने कहा, आदतों की ज़रूरत होती है: अपनी बात पर काबू रखने का अनुशासन, बिना नफ़रत के सच बोलने की हिम्मत, भरोसा बनाने के लिए धैर्य और न्याय के लिए अपने स्वार्थ को छोड़ने की इच्छा।”
कार्डिनल क्यूपिख ने कहा कि प्रभु येसु के लिए, ईश्वर की सच्ची सन्तान वे सेनापति नहीं हैं जो जीत और सेना के बल से शांति लाते हैं, बल्कि वे लोग हैं जो सिर्फ़ "शालोम" अर्थात् शांति को फिर से कायम करने के मकसद से संघर्षरत रहते हैं, क्योंकि यही पूर्णता और न्याय की यथार्थ संकल्पना है।