देवदूत प्रार्थना में पोप : हम विश्वास में पीछे न हटें, मसीह के लिए खुले रहें
रविवार को देवदूत प्रार्थना के दौरान पोप लियो 14वें ने ख्रीस्त के साथ व्यक्तिगत संबंध गहरा करने के महत्व पर चिंतन किया, जिससे कि वे हमारे जीवन और दुनिया को परिवर्तित कर सकें, जो कभी-कभी हमें अनजान रास्तों पर चलने के लिए प्रेरित कर सकता है।
वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 23 अगस्त को पोप लियो 14वें ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया। जिसके पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित किया।
उन्होंने रविवार के सुसमाचार पाठ पर चिंतन करते हुए कहा, “इस रविवार का सुसमाचार पाठ (मती. 16:13-20) हमें एक ऐसे सवाल से रूबरू कराता है जो हमारे विश्वास की यात्रा में हम में से हरेक से बात करता है: मेरे लिए, सचमुच में, येसु कौन हैं?”
सुसमाचार का यह अंश हमें समझाता है कि शिष्य बनने के अनुभव के लिए यह सवाल कितना जरूरी है। यद्यपि बारह प्रेरित अपने गुरु के साथ रहे थे और उनकी प्रेरिताई में सहभागी हुए थे, लेकिन येसु यह नहीं माने कि वे सच में उन्हें जानते हैं या ईश्वर के राज्य के रहस्य को समझ गए हैं। इसलिए, उनसे यह पूछने के बाद कि लोग उनके बारे में क्या कह रहे हैं, उन्होंने सीधे उनसे पूछा: “लेकिन तुम मुझे क्या कहते हो?” (मती.16:15)
हम सब कुछ जानते हैं के सोच के प्रलोभन पर काबू पाना
पोप ने कहा, “भाइयो और बहनो, यह हर उम्र के शिष्यों और हममें से हरेक के लिए एक बुनियादी सवाल है। विश्वास हमें एक ही बार में और हमेशा के लिए नहीं मिल जाता। बल्कि, हमें लगातार मसीह और उनके सुसमाचार के चेहरे को फिर से खोजने, उनके संदेश में और गहराई से उतरने एवं अपने जीवन में अपने फैसलों को नया करने की जरूरत है, ताकि वे हमारे दावों के अनुसार हों। इस तरह, हम यह सोचने के लालच पर काबू पा सकते हैं कि हम पहले से ही सब कुछ जानते हैं और विश्वास को सिर्फ आदत बना लेते हैं।”
पोप ने याद दिलाया कि हमसे यह सवाल हर दिन पूछा जाता है — मेरे लिए येसु कौन हैं, और मेरे जीवन में उनकी उपस्थिति का क्या मतलब है? — यह सवाल खासकर प्रार्थना में और जब हम सुसमाचार पाठ पर चिंतन करते हैं, तब उठता है। लेकिन यह सवाल तब भी उठता है जब हम अपने भाइयों और बहनों के जख्मों और जरूरतों को देखते हैं, और उन रिश्तों एवं परिस्थितियों में भी जो हमारे अंतःकरण को सबसे ज्यादा चुनौती देते हैं। अपने प्रतिदिन के जीवन में, सरल शब्दों में, हम यह पता लगा सकते हैं कि क्या प्रभु येसु हमारे लिए सिर्फ इतिहास के एक महान व्यक्ति हैं, जिन्होंने कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं और कीं, या वे ईश्वर के मसीह हैं, जिन्हें हमें पिता के प्यार में लाने और हमारे जीवन एवं जिस दुनिया में हम रहते हैं उसे बदलने के लिए भेजा गया है।
मसीह के साथ एक सच्चे रिश्ते के लिए खुले रहें
पोप ने कहा, “प्यारे भाइयो और बहनो, हम अपनी सोच और धार्मिक पक्केपन में न फंसे, बल्कि मसीह के साथ एक सच्चे रिश्ते के लिए खुले रहें। कभी-कभी, जब ख्रीस्तीय धर्म की बात आती है, तो हम सिर्फ उसी बात से खुश हो सकते हैं जो हमने “सुना है”, आम सोच से या जो हमें विरासत में मिली है, शायद अच्छे इरादों से भी। फिर भी येसु हमें व्यक्तिगत रूप से जवाब देने, उन्हें और करीब से जानने और हमेशा नई मुलाकात के जरिए उनके साथ दोस्ती करके खुद को ढालने के लिए कहते हैं। यह हमसे अनजान रास्तों पर चलने और हमारी सोच से अलग चुनाव करने के लिए भी कह सकता है।”
उन्होंने आगे कहा, “यह बात हमारी व्यक्तिगत यात्रा और कलीसिया की यात्रा, दोनों के लिए सच है, साथ ही हमारे प्रेरिताई पर लिए गये फैसलों के लिए भी, जब कभी हम सोचते हैं कि काम को सिर्फ उसी तरह करते रहना है जैसे हम हमेशा से करते आए हैं। तो यह पर्याप्त नहीं है, इसके बजाय, यह जरूरी है कि हम अक्सर खुद से पूछें: मेरे लिए प्रभु कौन हैं? क्या मैं उन्हें सच में जानता हूँ? आज उनका सुसमाचार मुझसे क्या माँग रहा है? मुझे कौन से कदम उठाने और कौन से फैसले लेने हैं?
तब माता मरियम से प्रार्थना करने का आह्वान करते हुए कहा, “आइए, हम धन्य कुँवारी मरियम को याद करें, जिन्होंने अपने बेटे के माध्यम से अपने दिल में ईश्वर की इच्छा खोजी, ताकि वे हमेशा हमें विश्वास के मार्ग पर रास्ता दिखा सकें।”
इतना कहने के बाद पोप ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।
