नैतिक रूप से तैयार न होने वाले समाज में बच्चों को AI सिखाना
भारत ने तय किया है कि बच्चों को कम उम्र से ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सीखना शुरू कर देना चाहिए।
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि 2026-27 एकेडमिक सेशन से तीसरी क्लास से ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटेशनल थिंकिंग को शामिल किया जाएगा। इसके लिए पूरे भारतीय स्कूल एजुकेशन सिस्टम में करिकुलम में इसे शामिल किया जाएगा, रिसोर्स मटीरियल उपलब्ध कराए जाएंगे और टीचरों को ट्रेनिंग दी जाएगी।
सरकारी भाषा काफी उत्साहजनक है। AI को एक "बेसिक यूनिवर्सल स्किल" और भविष्य के लिए तैयार करने वाली शिक्षा का हिस्सा बताया गया है।
एक स्तर पर, यह बात समझ में आती है। भारत पीछे नहीं रहना चाहता।
'इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026' को इरादे के एक बड़े ऐलान के तौर पर पेश किया गया था। सरकार ने कहा कि समिट में 118 देशों से लोग शामिल हुए, कुल मिलाकर 5,00,000 से ज़्यादा लोग आए, और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े निवेश के वादे US$250 बिलियन से ज़्यादा के रहे, साथ ही डीप-टेक में US$20 बिलियन के वादे भी किए गए।
लेकिन यहाँ एक गंभीर सवाल उठता है। क्या हम ऐसे समाज में बच्चों को AI सिखा रहे हैं जो नैतिक, शैक्षणिक और संस्थागत रूप से इसके लिए तैयार है? या हम एक ऐसे माहौल में एक ताकतवर टूल ला रहे हैं जो अभी भी असमानता, गलत जानकारी, कमज़ोर डिजिटल साक्षरता, परीक्षा के दबाव और नैतिक समझ की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है?
असली मुद्दा यही है।
बड़ों से तेज़ी से AI का इस्तेमाल कर रहे बच्चे
इसके सबूत पहले से ही मिल रहे हैं। 10 राज्यों में किए गए 'भारत सर्वे फॉर एडटेक 2025' में पाया गया कि एडटेक का इस्तेमाल करने वाले 35 प्रतिशत बच्चे सीखने के लिए पहले से ही जेनरेटिव AI (GenAI) का इस्तेमाल कर रहे हैं। और भी अहम बात यह है कि GenAI के बारे में जानने वाले लगभग 75 प्रतिशत बच्चे गलतफहमी में हैं कि यह एक साधारण इंटरनेट सर्च इंजन की तरह काम करता है।
दूसरे शब्दों में, समझ से ज़्यादा तेज़ी से इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है।
वही सर्वे बताता है कि AI बच्चों की सीखने की आदतों में कोई मामूली चीज़ नहीं है। GenAI का इस्तेमाल करने वाले बच्चों में से 96 प्रतिशत इसका इस्तेमाल स्कूल से जुड़ी पढ़ाई के लिए करते हैं, और 59 प्रतिशत सिर्फ़ स्कूल के काम के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं।
GenAI का इस्तेमाल सीखने के लिए किया जा सकता है, यह जानने वाले 66 प्रतिशत से ज़्यादा माता-पिता और टीचरों का मानना है कि इससे एडटेक से जुड़े जोखिम और बढ़ जाते हैं, जैसे टेक्नोलॉजी का ज़्यादा इस्तेमाल और गलत जानकारी।
यह टेक्नोलॉजी का विरोध नहीं है। यह एक चेतावनी है कि बड़े लोग खुद उन टूल्स की तरफ़ बच्चों को धकेलने के खतरों को देख रहे हैं, जिनके जोखिमों को कंट्रोल करने का तरीका उन्हें अभी तक नहीं पता है। यहीं पर बहस दार्शनिक हो जाती है।
शिक्षा और किसी चीज़ से वाकिफ़ होना (एक्सपोज़र) एक ही बात नहीं है। जो बच्चा प्रॉम्प्ट टाइप कर सकता है, ज़रूरी नहीं कि वह कुछ सीख रहा हो। जिसे तुरंत जवाब मिल जाते हैं, ज़रूरी नहीं कि वह चीज़ को समझ रहा हो। अगर AI स्कूलों में सिर्फ़ एक सुविधा देने वाली मशीन के तौर पर आता है, तो यह उन आदतों को कमज़ोर कर सकता है जिन्हें शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए: जैसे सब्र, ध्यान लगाना, जाँच-पड़ताल करना और सोच-विचार की धीमी लेकिन गरिमापूर्ण प्रक्रिया।
तैयारी का अंतर सिर्फ़ नैतिक नहीं है
बुनियादी सुविधाओं (इंफ्रास्ट्रक्चर) की स्थिति भी एक जैसी नहीं है। शिक्षा मंत्रालय के 2024–2025 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 64.7 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा है और 63.5 प्रतिशत में इंटरनेट की सुविधा है।
यह वाकई तरक्की है। लेकिन इसका मतलब यह भी है कि एक-तिहाई से ज़्यादा स्कूलों में अभी भी सार्थक डिजिटल लर्निंग के लिए ज़रूरी एक या दोनों बुनियादी सुविधाओं की कमी है। साथ ही, भारत में लगभग 24 करोड़ छात्रों को पढ़ाने के लिए 1 करोड़ से ज़्यादा स्कूल शिक्षक हैं। फिर भी, 1 लाख से ज़्यादा स्कूल सिर्फ़ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। यह कोई मामूली बात नहीं है। AI के आने से पहले ही, एक शिक्षक वाले स्कूल नैतिक और शिक्षण-संबंधी दबाव में होते हैं।
इसलिए हमें इस विरोधाभास को ईमानदारी से स्वीकार करना होगा।
भारत का ज़्यादातर स्कूली सिस्टम अभी भी असमान पहुँच, बहुत ज़्यादा उम्मीदों और कमज़ोर शिक्षक-समर्थन के बीच चल रहा है। यहाँ एक ख़तरा है। AI नीतिगत भाषणों में तरक्की का एक और निशान बन सकता है, जबकि असल क्लासरूम इसके ज़िम्मेदार इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं होंगे।
कहानी का वह हिस्सा जिस पर सबसे कम चर्चा होती है: शिक्षक
UNESCO का 2024 का 'शिक्षकों के लिए AI क्षमता फ़्रेमवर्क' कहता है कि शिक्षा अब शिक्षक-छात्र रिश्ते से आगे बढ़कर शिक्षक-AI-छात्र के नए तालमेल की ओर बढ़ रही है, और कई देशों ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि इस बदलाव के लिए शिक्षकों को किन क्षमताओं की ज़रूरत है। यह पाँच आयामों में 15 क्षमताओं की पहचान करता है: इंसान-केंद्रित सोच, AI की नैतिकता, AI की बुनियादी बातें और इस्तेमाल, AI-आधारित शिक्षण पद्धति, और पेशेवर सीखने के लिए AI।
यह सूची ही बहुत कुछ बताती है। यह कहती है कि स्कूलों में AI सिर्फ़ तकनीकी मामला नहीं है। यह नैतिक और शिक्षण-संबंधी मामला भी है।
UNESCO ने सरकारों से शिक्षा में जेनरेटिव AI को रेगुलेट करने का आग्रह किया है और क्लासरूम में ऐसे टूल्स के इस्तेमाल के लिए 13 साल की उम्र की सीमा तय करने का सुझाव दिया है, साथ ही शिक्षक प्रशिक्षण और नीतिगत सुरक्षा उपायों की भी बात कही है। भारतीय संदर्भ में यह बात ख़ास तौर पर अहम है। हम तीसरी कक्षा से ही AI से जुड़ी पढ़ाई शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन दुनिया की प्रमुख शिक्षा संस्था चेतावनी दे रही है कि कम उम्र के छात्रों द्वारा जेनरेटिव AI के इस्तेमाल के लिए बहुत ज़्यादा मज़बूत सुरक्षा उपायों की ज़रूरत है।