बौद्ध वासो हो सकता है अंतरधार्मिक शांति का पुल

म्यानमार में येसु धर्मसमाज के प्रान्ताध्यक्ष फा. गिरीश सन्तियागो कहते हैं कि वासो बौद्ध काल संघर्ष से जूझ रहे म्यांमार में ख्रीस्तानुयायियों और बौद्ध धर्मानुयायियों को सम्वाद, दया और पुनर्मिलन की ओर एक साझा रास्ता दिखा सकता है।

वासा आध्यात्मिक काल
वासा की अवधि या बौद्ध वासा गहन ध्यान, आध्यात्मिक सोच और भिक्षुओं को प्रसाद चढ़ाने की अवधि की शुरुआत का प्रतीक है। बारिश के मौसम में तीन महीने तक चलने वाला वासो आमतौर पर जून या जुलाई माह में पूर्णिमा के दिन शुरू होता है। फा. गिरीश ने कहा कि लगातार राजनीतिक अस्थिरता और मानवीय चुनौतियों का सामना कर रहे म्यानमार में बौद्ध धर्मानुयायियों का वासा काल अंतरधार्मिक मुलाकातों और साझा शांति निर्माण के लिए एक “सार्थक पुल” बन सकता है।   

म्यांमार अभी भी अधिकांशतः थेरवादी बौद्ध बहुल देश है, जहाँ की लगभग 87 प्रतिशत आबादी थेरवादी बौद्ध धर्मानुयायी हैं। तीन माह तक चलनेवाले वासो का मौसम म्यानमार के बौद्ध धर्मानुयायियों के लिये वह पवित्र समय है जब बौद्ध भिक्षु गहन मनन-चिन्तन, प्रार्थना, धार्मिक अध्ययन और ध्यान के लिए अपने मठों में ही रहते हैं। जबकि बौद्ध धर्म मानने वाले आम लोगों के लिये वासो आध्यात्मिक अनुशासन को गहरा करने, सख्त नैतिक नियमों का पालन करने और मठवासी समुदायों को वस्त्र, भोजन, मोमबत्तियाँ और ज़रूरी सामान देकर उदारता दिखाने का समय होता है।

फादर गिरीश ने कहा कि हालांकि, "वासो, ख्रीस्तीयों का धर्मविधिक त्योहार नहीं है तथापि, इसके मौलिक आध्यात्मिक मूल्य अंतरधार्मिक मुलाकात और आपसी समझ के लिए एक सार्थक सेतु प्रदान करते हैं।"

साझा आस्था और परंपरा के छह स्तंभ
फादर गिरीश ने छह क्षेत्रों की पहचान की जिनमें वासो का बौद्ध अनुपालन और काथलिक   आध्यात्मिकता एक जैसी हैं। सर्वप्रथम उन्होंने सबसे मनन-चिन्तन और प्रार्थना की ओर संकेत किया और कहा कि बौद्ध धर्म में एकांतवास और ध्यान करने का समर्पण सन्त मारकुस रचित सुसमाचार में निहित येसु द्वारा अपने शिष्यों को दिए गए बुलावे जैसा है: “तुम सब अकेले ही मेरे साथ निर्जन स्थान चले आओ और थोड़ा विश्राम कर लो।”

समानता
फा. गिरीश ने वासो के आध्यात्मिक अनुशासन और काथलिक चालीसाकाल के बीच भी एक समानता बताई जिसमें दोनों में प्रार्थना, पश्चाताप, खुद को नकारना और दान पर ज़ोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि प्रेम पूर्ण दया पर बौद्ध धर्म की शिक्षा तथा करुणा भी ख्रीस्तीय धर्म के पड़ोसी प्रेम सम्बन्धी  आदेश से मेल खाती है। फा. गिरीश ने कहा कि दोनों ही धर्म अपने अनुयायियों से दुखी लोगों की की सेवा का आग्रह करते हैं।

उन्होंने अहिंसा और मेल-मिलाप पर भी ज़ोर दिया और कहा कि दोनों परम्पराएं मानव गरिमा को बनाए रखती, घृणा को नकारती, क्षमा, शांति और कमज़ोर लोगों की सुरक्षा को बढ़ावा देती हैं। साथ ही दोनों धार्मिक परंपराएं सादगी और अलगाव पर भी ज़ोर देती तथा उपभोक्तावाद और खुद पर ध्यान देने को चुनौती देती हैं। इसी प्रकार, दोनों ही धर्मों में अन्तरधार्मिक सम्वाद एवं मैत्री पर बल दिया गया है।  

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