पोप लियो : हम शांति की रक्षा करने और बढ़ावा देने के लिए बुलाये गये हैं

पोप लियो 14वें ने 13 अक्टूबर को परमधर्मपीठीय ग्रेगोरियन यूनिवर्सिटी में धन्य पोप जॉन पॉल प्रथम पर आयोजित एक कॉन्फ्रेंस को एक संदेश भेजा, और सभी लोगों एवं संस्थाओं से शांति को बचाने और बढ़ावा देने हेतु अपना सहयोग देने की अपील की।

पोप ने संदेश में लिखा, “शांति की रक्षा करना और उसे बढ़ावा देना हम सबकी जिम्मेदारी है और साथ ही, यह एक ऐसा मिशन है जिसे हमें अपने दैनिक जीवन के हर पहलू में धैर्यपूर्वक पूरा करना होगा।”

पोप लियो 14वें ने अस्पताल जाने से पहले, मंगलवार को वाटिकन जॉन पॉल प्रथम फाउंडेशन के अध्यक्ष कार्डिनल पीएत्रो पारोलिन को एक संदेश भेजा था। यह संदेश फाउंडेशन द्वारा आयोजित “जॉन पॉल प्रथम: यूस्तिसिया एत पैक्स ‘इस परेशान दुनिया में शांति की रक्षा करना और उसे बढ़ावा देना’’ पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को दिया गया।

पोप ने सम्मेलन के आयोजकों, वक्ताओं और उसके प्रतिभागियों को अपनी शुभकामनाएँ दी, साथ ही परमधर्मपीठीय ग्रेगोरियन यूनिवर्सिटी में हो रही इस सम्मेलन के अच्छे परिणामों के लिए बधाई दीं।

शांति की रक्षा करना हरेक की जिम्मेदारी
पोप ने कहा कि इस सम्मेलन की विषयवस्तु मानवता के भविष्य के लिए आशा का संदेश देता है, जिसका ध्यान हरेक व्यक्ति के लिए शांति बनाने की जिम्मेदारी पर है।

पोप फ्राँसिस का जिक्र करते हुए, जिन्होंने जोर दिया था कि “शांति सिर्फ युद्ध का न होना नहीं है,” पोप लियो ने आगे कहा कि संत अगुस्टीन शांति को प्रशान्ति और व्यवस्था का फल बताते हैं।

यह दोहराते हुए कि “शांति के लिए हर इंसान की प्रतिष्ठा और बुनियादी अधिकारों का सम्मान, साथ ही लोगों के बीच एकजुटता जरूरी है,” पोप लियो ने जोर देकर कहा, “इस दृष्टिकोण से, न्याय एक जरूरी शर्त बन जाता है।”

जॉन पॉल प्रथम की सीख हमें पक्की शांति पाने के लिए आमंत्रित करती है
पोप ने आगे याद दिलाया कि धन्य पोप जॉन पॉल प्रथम ने, “अपनी आसान और सरल भाषा में, भरोसे पर आधारित इंसानी रिश्ते बनाने में व्यक्तिगत सहभागिता, भाईचारा और उदारता की आवश्यकता पर जोर दिया था।”

पोप लियो ने कहा कि यह शिक्षा हमें याद दिलाती है कि अंतरराष्ट्रीय शांति परिवार, स्कूल और समुदाय में शुरू होती है, और फिर संस्थाओं तक पहुँचती है।

इस दृष्टिकोण से, पोप ने कहा कि जॉन पॉल प्रथम की शिक्षा पर आज फिर से विचार किया जाना चाहिए, और इसे “शांति को एक अमूर्त विचार न मानने का बुलावा” बताया, जिसे सिर्फ उन लोगों को सौंपा गया है जिन पर देशों के बीच स्थिरता और सामाजिक मेलजोल पक्का करने की बड़ी जिम्मेदारी है।

संत पापा ने जोर देकर कहा, “बुरी तरह हिली हुई दुनिया में, शांति को बचाने और बढ़ावा देने का मतलब है जो विभाजित है उसे ठीक करना, सबसे कमजोर लोगों की रक्षा करना, माफ करना और समझना, दूसरों की बात सुनना और उन्हें पहचानना, लोगों को सच्ची बातचीत के लिए प्रेरित करना, और ‘भाईचारा’ शब्द को पुनः एक ठोस कलीसियाई, सामाजिक और राजनीतिक पहलू देना।”

पोप लियो ने यह उम्मीद जताते हुए अपनी बात समाप्त की कि चिंतन का यह दिन पोप जॉन पॉल प्रथम के प्रेरितिक कार्य और धर्मशिक्षा की समझ को गहरा करने का अच्छा अवसर साबित हो। पोप ने अंत में सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

hindi Survey Popup Image