ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी के हत्यारे की समय से पहले रिहाई की अर्ज़ी को ओडिशा राज्य ने ठुकराया
कलीसिया के नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पूर्वी ओडिशा राज्य द्वारा ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो छोटे बेटों की 27 साल पहले हत्या करने वाले दोषी की समय से पहले रिहाई की अर्ज़ी को ठुकराने का स्वागत किया है।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार ने 15 सितंबर को ओडिशा राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया, "सरकार का फ़ैसला ज़मीनी हक़ीक़त और ऐसे कदम के संभावित नतीजों को ध्यान में रखकर लिया गया था।"
रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य की सज़ा समीक्षा बोर्ड (SSRB) ने 31 अगस्त की अपनी बैठक में कानून-व्यवस्था की संभावित समस्याओं और सांप्रदायिक तनाव की चिंताओं का हवाला देते हुए सिंह की समय से पहले रिहाई की सिफ़ारिश करने से इनकार कर दिया।
यह फ़ैसला 17 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा जाएगा। देश की शीर्ष अदालत ने 8 सितंबर को मामले की पिछली सुनवाई के दौरान, सिंह की सज़ा में छूट की अर्ज़ी पर फ़ैसला न लेने के लिए ओडिशा सरकार को फटकार लगाई थी।
कुछ शर्तों के तहत, भारतीय राज्य सरकारें सज़ा में छूट देकर दोषी कैदियों को समय से पहले रिहा कर सकती हैं।
दारा सिंह, जिन्हें रवींद्र कुमार पाल के नाम से भी जाना जाता है, उम्रकैद की सज़ा काट रहे हैं। उन्हें 22 जनवरी 1999 को ओडिशा के क्योंझर ज़िले में स्टेन्स और उनके दो छोटे बेटों - 10 साल के फिलिप और 6 साल के टिमोथी - को उनकी जीप में सोते समय ज़िंदा जलाने का दोषी ठहराया गया था।
कटक-भुवनेश्वर आर्चडायसिस (जिसके अधिकार क्षेत्र में राज्य की राजधानी आती है) के अधिकारी फादर दिबाकर परिछा ने UCA न्यूज़ को बताया, "ईसाई होने के नाते हम सभी के लिए यह बहुत बड़ी राहत की बात है।"
उन्होंने कहा कि बोर्ड का फ़ैसला महत्वपूर्ण था क्योंकि सिंह को हत्या के तीन मामलों में दोषी ठहराया गया था।
सिंह 35 वर्षीय कैथोलिक पादरी अरुल डॉस और मुस्लिम कपड़ा व्यापारी शेख रहमान की हत्या से जुड़े दो अन्य मामलों में भी उम्रकैद की सज़ा काट रहे हैं।
पादरी ने कहा, "उन्हें सज़ा में छूट देने से समाज में यह ग़लत संदेश जाता कि ऐसे अपराध करने के बाद भी लोग बिना सज़ा पाए बच सकते हैं।"
परिछा ने कहा कि राज्य में ईसाई समुदाय के लिए इस मामले का अभी भी बहुत महत्व है। उन्होंने कहा, "दारा सिंह समाज के लिए खतरनाक है क्योंकि उसने ऐसा अपराध किया जिसमें बेगुनाह लोगों की जान गई — एक ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी और उनके दो बच्चे, और एक पादरी जो गरीबों के बीच समाज सेवा का काम कर रहे थे।"
मानवाधिकार कार्यकर्ता और ओडिशा लॉयर्स फोरम के सदस्य फादर अजय कुमार सिंह ने इस फैसले का स्वागत किया।
उन्होंने UCA न्यूज़ से कहा, "ऐसे मामले में सज़ा कम करने या रिहाई पर विचार करते समय सिर्फ़ रिहाई चाहने वाले व्यक्ति के नज़रिए से नहीं देखना चाहिए, बल्कि पीड़ितों, प्रभावित समुदायों, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है।"
हिंदू संगठन बजरंग दल (भगवान हनुमान की सेना) के कार्यकर्ता सिंह का दावा है कि अब उन्हें "जवानी के जोश में" किए गए अपराधों पर पछतावा है।
उन्हें और महेंद्र हेम्ब्रम को इस अपराध के लिए दोषी ठहराया गया था और 2003 में मौत की सज़ा सुनाई गई थी।
सिंह ने सज़ा में छूट पर विचार के लिए ज़रूरी जेल की अवधि पूरी करने के बाद, ओडिशा की 2022 की छूट नीति के तहत समय से पहले रिहाई की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट में 17 सितंबर को होने वाली सुनवाई में ओडिशा सरकार के फ़ैसले पर विचार किए जाने और सिंह की सज़ा में छूट की याचिका पर अगले कानूनी कदम के बारे में तय किए जाने की उम्मीद है।
