अल्पसंख्यक नेताओं ने कर्नाटक से धर्मांतरण विरोधी कानून को रद्द करने की मांग की
बेंगलुरु, 30 अक्टूबर, 2026: धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों, नागरिक समाज संगठनों और मानवाधिकार समर्थकों के प्रतिनिधियों ने कर्नाटक सरकार से आग्रह किया है कि वह 'कर्नाटक धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण अधिनियम, 2022' को रद्द करके अपना वादा और संवैधानिक दायित्व पूरा करे।
इन नेताओं ने सरकार से यह भी मांग की कि वह नफरत फैलाने वाले भाषणों और गतिविधियों के खिलाफ सुरक्षा के लिए एक व्यापक नीति बनाए। उन्होंने मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों और कमजोर समुदायों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
29 अक्टूबर को जारी एक संयुक्त बयान में, प्रतिनिधियों ने कहा कि धर्मांतरण विरोधी कानून धार्मिक अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को ही अपराध की श्रेणी में ला देते हैं और अनुच्छेद 25 के तहत दी गई 'अंतरात्मा की स्वतंत्रता' के संवैधानिक वादे को कमजोर करते हैं।
इस संयुक्त अपील पर बैंगलोर के आर्कबिशप पीटर मचाडो और 'कर्नाटक राज्य मुस्लिम ओक्कूटा' (KRMO) के संयोजक मोहम्मद याह्या दामुदी ने हस्ताक्षर किए और इसका समर्थन किया।
धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से ईसाइयों के लिए, यह कानून उनकी धार्मिक पहचान, उनके अस्तित्व और अपनी आस्था को प्रकट करने के अधिकार पर संदेह पैदा करता है।
उन्होंने इस कानून के कड़े प्रतिबंधों और दखल देने वाली प्रक्रियाओं को एक अस्वीकार्य 'संवैधानिक अतिरेक' (constitutional overreach) बताया। उन्होंने कहा कि इससे संवैधानिक स्वतंत्रता, आपराधिक मुकदमों के डर के साये में की जाने वाली गतिविधि बनकर रह जाएगी।
नेताओं ने कहा कि कर्नाटक के पास अन्य राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण पेश करने का मौका है। वह इस कानून को रद्द करने के अपने वादे को पूरा करके समानता, गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटियों में लोगों का भरोसा फिर से बहाल कर सकता है।
धर्मांतरण विरोधी कानून को रद्द करने के अलावा, इन समूहों ने नफरत भरे भाषणों (हेट स्पीच), सांप्रदायिक भड़काऊ गतिविधियों और शत्रुता से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की।
डराने-धमकाने और हिंसा की धमकियों को लेकर बढ़ती चिंताओं का हवाला देते हुए, उन्होंने राज्य सरकार से 'हेट क्राइम' (नफरत से जुड़े अपराधों) से जुड़े कानूनी ढांचे की समीक्षा करने, उसे मजबूत करने और उसमें संशोधन करने की अपील की। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन किए बिना, इन कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए, समय पर जांच होनी चाहिए और जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
इसके अलावा, इन समूहों ने राज्य सरकार से यह भी कहा कि वह पिछली सरकार द्वारा लागू की गई नीतियों के संबंध में अपने चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करे। इनमें ऐसी नीतियां शामिल हैं जो समाज के हाशिए पर रहने वाले और वंचित वर्गों को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए: 'कर्नाटक पशु वध रोकथाम और मवेशी संरक्षण अधिनियम, 2020'; 27 मार्च 2023 को कैबिनेट सरकारी आदेश के जरिए मुसलमानों के लिए 'कैटेगरी 2B' आरक्षण को खत्म करना; 'भूमि सुधार अधिनियम' संशोधन विधेयक; और 'चार श्रम संहिताएं'।
नेताओं ने राज्य सरकार से इन कानूनों को रद्द करने और विकास के लिए एक संतुलित, संवैधानिक रूप से सही ढांचा तैयार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि ये नीतियां हाशिए पर रहने वाले लोगों की आजीविका के लिए खतरा हैं और उनमें असुरक्षा की भावना पैदा करती हैं।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कर्नाटक की ताकत उसकी धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता की समृद्ध परंपरा में निहित है। उन्होंने सरकार से अपने वादों को ठोस विधायी कदमों में बदलने की अपील की।
