पोप लियोः विवाह समाज का विद्यालय और नींव

पोप लियो 14वें ने अपने बुधवारीय आमदर्शन की धर्मशिक्षा में विवाह पर प्रकाश डालते हुए उसे “मानवता हेतु एक बृहृद विद्यालय” और “समाज की नींव” परिभाषित किया।

पोप ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रागँण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात और सुस्वागतम्।

पोप ने अपनी धर्मशिक्षा के पूर्व सभों के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हुए कहा, “आपकी प्रार्थना से लिए धन्यवाद। ईश्वर की उदारता के लिए धन्यवाद। आइए हम सब ईश्वर की अच्छाई में अपने विश्वास को नवीकृत करें।”  

पोप ने इसके बाद अपनी धर्मशिक्षा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि द्वितीय वाटिकन धर्मसभा का धर्मसिद्धांत गौदियुम एत स्पेस, अपने पहले भाग में मानव सम्मान और विश्व में उसकी बुलाहट का जिक्र करने के उपरांत, दूसरे भाग में, सुसमाचार के प्रकाश और मानवीय अनुभव के अनुरूप, समकालीन कुछ अति विशेष मुद्द् पर प्रकाश डालता है। यह खास रुप से विवाह और परिवार पर ध्यान केन्द्रित कराता है, इस विश्वास के संग कि “व्यक्ति तथा मानव और ख्रीस्तीय समाज की भलाई, विवाह और परिवार से बनने वाले समुदाय की स्वस्थ स्थिति से गहरे रुप में जुड़ी हुई है।”

वैवाहिक जीवन में साझेदारी
इस संदर्भ में, यह न केवल इसके मूल्यों और लक्ष्यों पर जोर देता है, बल्कि यह विवाह के एक नवीन विचार को “वैवाहिक जीवन और प्रेम की अंतरंग साझेदारी” स्वरुप व्यक्त करता है। वैवाहिक जीवन के संवैधानिक आयाम में प्रवेश करते हुए जहाँ हम इस मिलन की आधारशिला में “वैवाहिक विधान” की समझ को पाते हैं, यह उस विचार को व्यक्त करता है जिसके द्वारा “दंपत्ति, अपने मानवीय कार्य में एक दूसरे को स्वीकारते और अपने को देते हैं।” नर और नारी का पारस्परिक रुप में अपने को देना, जहाँ हम उनके दो नहीं बल्कि एक होने की बात सुनते हैं, उनमें “सम्पूर्ण निष्ठा” की माँग करती है, जो “अटूट एकता” में निहित है, यह संतान उत्पत्ति और उनके लालन-पालन में ठोस रूप में अभिव्यक्त होती है। तृत्वमय ईश्वर में चिंतन के अनुरूप, दांपत्य और मातृ-पितृ प्रेम, विवाह संस्कार के द्वारा ख्रीस्त के मुक्तिदायी शक्ति से संचालित और समृद्ध होता है, जिससे दंपत्ति एक दूसरे को प्रेम कर सके “उसी रुप में जैसे उन्होंने कलीसिया को प्रेम किया और अपने को उसके लिए निछावर किया।

वैवाहिक प्रेम केवल कामुक आकर्षण नहीं
पोप ने ख्रीस्त के प्रेम के आलोक में वैवाहिक जीवन की सच्चाई पर प्रकाश डालते हुए, जो मानव और दिव्य दोनों प्रेम की सच्चाई है, आगे कहा कि गौदियुम एत स्पेस हमारा ध्यान दांपत्य प्रेम और वैवाहिक फलप्रदता की ओर कराती है। वैवाहिक प्रेम केवल कामुक आकर्षण तक सीमित नहीं है, यद्यपि यह उसमें शामिल है, हम इसमें पति-पत्नी की पूरी इच्छाशक्ति को पाते हैं, यह उनके हृदयों के स्नेह को जीवंत बनाता है और अपने को संवेदनाओं और कोमलता भरी भावनात्मक चिन्हों के माध्यम प्रकट करता है। नर और नारी की सम्पूर्ण अच्छाई का आलिंगन करना, जो अपने मानवीय सम्मान में बराबर हैं, यह प्रेम दंपत्तियों के पूरे जीवन में बना रहता है, और अपने को वैवाहिक जीवन की क्रियाकलापों में विशेष रुप से व्यक्त करता है। जबकि पति-पत्नी के बीच की अनूठी आत्मीयता, जो एक-दूसरे के प्रति गहरे प्रेम को दर्शाती है,  उनके आपसी समर्पण को बढ़ावा देती है और उनके साझा आनंद को समृद्ध बनाती है।

संतान विवाह के सर्वोतम उपहार
पोप लियो ने कहा कि इससे भी बढ़कर दांपत्य का फलहित होना अपने को संतान उत्पत्ति में प्रकट करता है, जो “विवाह का सर्वोतम उपहार है”। मावन जीवन का संचार करते हुए और उसकी शिक्षा-दीक्षा करते हुए, जिसका परित्याग कभी भी नहीं किया जाना चाहिए, दंपत्ति सृष्टिकर्ता ईश्वर के प्रेम संग “सहयोगकर्ता” बनते हैं, और यदि कहा जाये तो वे उस प्रेम के अनुवादक होते हैं। मानव और ख्रीस्तीय उत्तरदायित्व हेतु इस बुलावे में, वे अपने और अपने बच्चों-चाहे वे जन्म ले चुके हों या जन्म लेने वाले हैं-उनकी भलाई से संबंधित सही निर्णय के आधार पर चलने के लिए बाध्य हैं। इस प्रकार का एक निर्णय, दंपत्तियों को अपने में दिव्य संहिता के अनुरूप अंतर-आत्मा के संयुक्त होने की मांग करता है, जैसे की हम कलीसिया के धर्मसिद्धांत को सुसमाचार के आलोक में परिभाषित पाते हैं।

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