परमाणु बयानबाज़ी की वापसी पर परमधर्मपीठ ने जताई चिन्ता
निरस्त्रीकरण और बहुपक्षीय विनियोजन की मांग करते हुए, परमधर्मपीठ ने चेतावनी दी है कि नाभिकीय बहसों, शस्त्रों और शस्त्रागारों के आधुनिकीकरण तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता से प्रेरित सैन्य निकाय से ग़लत जोड़-घटाव का खतरा बढ़ रहा है।
गम्भीर क्षण
बुधवार को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में परमाणु हथियारों की अप्रसार संधि के ग्यारहवें समीक्षा सम्मेलन की आम बहस को संबोधित करते हुए परमधर्मपीठ के स्थायी पर्यवेक्षक मिशन ने इस क्षण को “बहुत गंभीर” निरूपित किया।
बढ़ते भू-राजनैतिक तनाव और कमज़ोर होते हथियार नियत्रण ढाँचे की पृष्ठभूमि में परमधर्मपीठीय प्रतिनिधिमण्डल ने नाभिकीय बयानबाज़ी की वापसी पर चिंता जताई जिसमें नाभिकीय हथियारों के संभावित उपयोग और परीक्षण से जुड़े खतरे भी शामिल थे।
बहुपक्षीय कूटनीति से दूर
पोप लियो 14 वें को उद्धृत कर प्रतिनिधिमण्डल ने बहुपक्षीय कूटनीति से दूर होते जा रहे बदलाव पर दुख जताया और कहा कि बातचीत और आम सहमति पर आधारित कूटनीति की जगह अब “ताकत पर आधारित” कूटनीति ले रही है। उन्होंने परमाणु ठिकानों पर हाल के हमलों को भी विश्वव्यापी सुरक्षा हेतु दीर्घकाल से चले आ रहे नियमों के खत्म होने का संकेत बताया।
परमाणु फैसले लेने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती भूमिका पर विशेष रूप से चिंता व्यक्त की गई। परमधर्मपीठ ने चेतावनी दी कि ऐसे निकाय संकट के समय में मानवीय सोच-विचार के लिए समय कम कर देते हैं, जिससे “गलत जोड़-घटाव का खतरा” बढ़ जाता है और जीवन एवं मृत्यु के चयनों का नैतिक महत्व धुंधला पड़ जाता है।
परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग
परमाणु अप्रसार संधि के महत्व को पुनः प्रकाशित करते हुए परमधर्मपीठीय प्रतिनिधिमण्डल ने कहा कि इसके तीन स्तम्भ निरस्त्रीकरण, अप्रसार और परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग अन्तरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का लिये नितान्त आवश्यक हैं।
परमाणु हथियारों के ख़तरनाक मानवीय परिणामों की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए परमधर्मपीठ ने नाभिकीय हथियारों पर रोक लगाने वाली संधि पर अपना समर्थन दोहराया और कहा कि यह निरस्त्रीकरण के लिए नैतिक और कानूनी ढांचे को मजबूत करती है।
परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर परमधर्मपीठ ने देशों के अपने दायित्वों के अनुसार शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी विकसित करने के अधिकार की पुष्टि की तथा औषधियाँ, कृषि, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण सुरक्षा में इसके सदुपयोग पर ध्यान देने का आह्वान किया। प्रतिनिधिमण्डल ने कहा कि यथार्थ शांति, भय पर आधारित नहीं हो सकती, इसके बजाय इसे “भरोसे, बातचीत और हमारी साझा मानवता की पहचान” पर निर्मित किया जाना चाहिए।