देवदूत प्रार्थना में ख्रीस्तियों से पोप : घृणा का जवाब प्रेम दें

पोप लियो 14वें ने ख्रीस्तीयों से कहा है कि वे अपनी प्रेरिताई को ख्रीस्त के साथ व्यक्तिगत मुलाकात और चिंतन पर आधारित करें, और उनके साथ गहरे संबंध द्वारा शक्ति प्राप्त कर आशा, प्रेम और लगन के साथ हर परिस्थिति में सुसमाचार का साक्ष्य दें।

पोप लियो 14वें ने रविवार 22 जून को वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया। जिसके पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित किया।

पोप ने सुसमाचार पाठ पर चिंतन करते हुए कहा, आज की धर्मविधि के सुसमाचार पाठ में (मती.10,26-33) येसु शिष्यों को मिशन पर भेजते हुए, अन्य बातों के साथ साथ, उन्हें यह सलाह देते हैं: "मैं जो तुम से अंधेरे में कहता हूँ, उसे तुम उजाले में सुनाओ। जो तुम्हें फुस-फुसाहटों में कहा जाता है, उसे तुम पुकार-पुकार कर कह दो।" (27)

सुसमाचार की घोषणा
संत पापा ने कहा, वे उन बातों के बीच एक समरूपता दिखाते हैं जो हम "कान से" सुनते हैं, यानी हमारे दिल के राज में क्या है, और जिन्हें हम सबको बताने के लिए बुलाए गए हैं, और वे हमें याद दिलाते हैं कि सुसमाचार की घोषणा के लिए सबसे पहले और सबसे जरूरी है प्रभु से एक व्यक्तिगत मुलाकात को साझा करना, जो हरेक के लिए अनुठा होता है।

पवित्र आत्मा से सहायता
वास्तव में, किसी भी प्रेरिताई की शक्ति, सिर्फ तकनीकी और उपकरणों से बढ़कर, हमारे अंदर पवित्र आत्मा के कार्य और हमारे जवाब की प्रमाणिकता पर आधारित है। संत थॉमस एक्विनस प्रवचन को दूसरों तक वैसे ही पहुँचाने की सलाह देते हैं जैसा हमने चिंतन किया है: "कोंतेम्पलाता अलीस त्रादेरे" (सुम्मा थियोलोजिया, III, q. 40, a. 1, ad 2)।

येसु के साथ संबंध गहरा होना चाहिए
संत पापा ने सभी ख्रीस्तीयों को चिंतन करने का प्रोत्साहन देते हुए कहा, “हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि "ध्यान साधना" एक खास अनुभव है, जो कुछ संतों या मठवासियों और तपस्वी लोगों के लिए ही है। हम सभी इसे कर सकते हैं, अपने दैनिक जीवन के कार्यों के बीच शांत रहने का समय निकालकर, जिसमें हम ईश्वर के सामने मौन रह सकें, उनकी आवाज सुन सकें, अपनी खुशियाँ और परेशानियाँ उनसे साझा कर सकें, उनके साथ अपने जीवन का अवलोकन कर सकें। यह हमें और अधिक मजबूत और जागरूक विश्वास पाने में मदद करता है, और जिसके परिणामस्वरूप, हम एक भरोसेमंद और स्वतंत्र शिष्य बनते हैं, ऐसे पुरुष और महिला जो जीवन के हर माहौल एवं परिस्थिति में सुसमाचार की रोशनी दिखा सकें, और जहाँ इसकी कीमत समझी या मानी नहीं जाती, वहाँ भी इसकी गवाही दे सकें।

येसु के साथ गहरा संबंध
सुसमाचार लेखक संत मती इस पाठ में उन समुदायों के बारे लिखते हैं जिनका जीवन  आसान नहीं था। उन्हें दुश्मनी और जुल्म का सामना करना पड़ रहा था, जैसा कि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में अनेक ख्रीस्तीय झेलते हैं, उनके लिए निराश होने और थकान या डर के आगे झुकने का बहुत बड़ा प्रलोभन था।

अब भी, पहले की तरह, येसु की शिक्षाओं पर वफादार रहना और उनके वचन का प्रचार करना मुश्किल है: नफरत का जवाब प्यार से, घमंड का जवाब विनम्रता से, और निराशा का जवाब हिम्मत से देना।

यही कारण है कि हमें अपने विश्वास और मिशन की जड़ को मजबूत करना है, उनके साथ गहरा संबंध जोड़ने के द्वारा (पोप फ्राँसिस प्रेरितिक प्रबोधन एवंजेली गौदियुम, 8)। इससे हमें हिम्मत मिलती है कि हम हार न मानें और सभी को, हर हालात में, उम्मीद, प्यार और शांति का उनका संदेश देते रहें। दुनिया को इसकी बहुत जरूरत है!

माता मरियम से प्रार्थना
अतः संत पापा ने माता मरियम से प्रार्थना करते हुए कहा, “कुँवारी मरियम हमें हरेक की बुलाहट के अनुसार, प्रभु येसु के मिशनरी शिष्य होने में मदद करें।”  

इतना कहने के बाद संत पापा ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।