एक बीमार हिंदू की प्रार्थना की गुजारिश के चलते दो ईसाई जेल में पहुंचे

40 वर्षीय हिंदू, रवि प्रजापति ने कभी नहीं सोचा था कि उनके दो ईसाई दोस्तों की एक छोटी सी नेकी उन्हें जेल पहुंचा देगी।

उत्तर प्रदेश के परसौनी गांव के रहने वाले प्रजापति चार साल से अधिक समय से किडनी की बीमारी से जूझ रहे हैं, जिससे वे शारीरिक रूप से कमजोर और आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं।

जब इलाज से कोई राहत नहीं मिली, तो उन्होंने प्रार्थना का सहारा लिया। अपनी हिंदू प्रार्थनाओं के साथ-साथ, उन्होंने अपने दो ईसाई दोस्तों से भी अपने घर पर प्रार्थना करने के लिए कहा। यहीं से उनकी मुश्किलें शुरू हो गईं।

5 अक्टूबर को हो रही प्रार्थना सभा में अचानक पुलिस आ गई और उन दो ईसाइयों को हिरासत में ले लिया।

पुलिस ने बताया कि उन्हें एक स्थानीय निवासी की शिकायत मिली थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि ये लोग हिंदू बहुल गांव में चल रहे एक "धर्मांतरण नेटवर्क" का हिस्सा हैं।

इन पर कथित तौर पर धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में आपराधिक मामला दर्ज किया गया है। यह अपराध 'उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021' के तहत दंडनीय है।

प्रजापति ने कहा, "मैं हिंदू हूं और हिंदू ही रहूंगा। मैंने उन्हें सिर्फ प्रार्थना करने के लिए बुलाया था क्योंकि मैं बीमार हूं। किसी ने मेरा धर्म नहीं बदला है।"

हटा पुलिस स्टेशन के एक पुलिस अधिकारी, दीपक कुमार सिंह ने बताया कि अवैध धर्म परिवर्तन के आरोपों की जांच चल रही है।

देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य, उत्तर प्रदेश (जहां लगभग 24.4 करोड़ लोग रहते हैं), उन कम से कम 12 राज्यों में शामिल है, जिन्होंने धर्मांतरण विरोधी कड़े कानून लागू किए हैं। इनमें से ज्यादातर राज्यों में हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार है।

ईसाई नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि उत्तर प्रदेश में इस कानून का इस्तेमाल ईसाई और मुस्लिम जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।

'यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम' (UCF) के अनुसार, जो नई दिल्ली स्थित एक ईसाई संगठन है और ईसाइयों के उत्पीड़न की घटनाओं पर नज़र रखता है, भारत में ईसाइयों पर होने वाले हमलों की सबसे अधिक संख्या इसी राज्य में दर्ज की गई है। जेसुइट पादरी सेड्रिक प्रकाश, जो मानवाधिकार, सुलह और शांति कार्यकर्ता तथा लेखक हैं, ने कहा कि पुलिस को किसी शांतिपूर्ण प्रार्थना सभा में बाधा डालने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसी सभाएं अक्सर प्रार्थना की 'ठीक करने की शक्ति' (healing power) में लोगों की आस्था से प्रेरित होती हैं, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।

उन्होंने बताया कि यह घटना ईसाइयों के प्रति बढ़ती शत्रुता का एक ताज़ा उदाहरण है। इस शत्रुता को धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है, जो कानून का दुरुपयोग करते हैं।

ईसाई समुदाय से जुड़े और 'परसिक्यूशन रिलीफ' (Persecution Relief) नामक संस्था के संस्थापक शिबू थॉमस ने इस घटना को मानवता के पतन के रूप में वर्णित किया।

थॉमस ने कहा, "प्रार्थना आस्था, करुणा और उम्मीद का प्रतीक है, खासकर उन लोगों के लिए जो बीमारी से जूझ रहे हैं। जब कोई बीमार व्यक्ति अपनी सेहत में सुधार के लिए दूसरों को प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित करता है, तो इसे संदेह की नज़र से देखने के बजाय मानवता के एक कार्य के रूप में देखा जाना चाहिए।"

"हम कानून का सम्मान करते हैं और मानते हैं कि हर आरोप की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। साथ ही, किसी भी व्यक्ति को सिर्फ प्रार्थना करने या प्रार्थना स्वीकार करने के कारण डर के साये में नहीं जीना चाहिए।"

थॉमस ने कहा कि यह मुद्दा किसी को दोषी ठहराने या निंदा करने का नहीं है, बल्कि हर भारतीय की गरिमा, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने का है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।

उन्होंने कहा, "प्रार्थना लोगों को करुणा के साथ एक-दूसरे के करीब लानी चाहिए, न कि डर के ज़रिए उन्हें बांटना चाहिए।"

UCF की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और हरियाणा उन राज्यों में शामिल हैं जहाँ ईसाइयों पर हमलों की दर काफी अधिक है।

UCF के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल ईसाइयों से जुड़ी सैकड़ों घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश में अक्सर सबसे ज़्यादा मामले दर्ज किए जाते हैं।

कई मामलों की शुरुआत इन आरोपों से होती है कि पादरियों या प्रचारकों ने धर्म परिवर्तन कराने के लिए लोगों को प्रलोभन दिया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जांच में अक्सर जबरन धर्म परिवर्तन का कोई सबूत नहीं मिलता, फिर भी लोगों की गिरफ्तारियां होती हैं, उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है और सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है।

कैथोलिक मानवाधिकार कार्यकर्ता और दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व सदस्य ए.सी. माइकल ने कहा, "भले ही अंत में अदालतें इन आरोपों को खारिज कर दें, लेकिन यह पूरी कानूनी प्रक्रिया ही अपने आप में एक सज़ा बन जाती है।"

उन्होंने कहा, "लोगों को अपना बचाव करने में महीनों लग जाते हैं। परिवारों को कष्ट झेलना पड़ता है और समुदायों में डर का माहौल बन जाता है।"

मानवाधिकार समूहों का कहना है कि ईसाइयों से जुड़े मामलों में उत्तर प्रदेश का 'धर्म परिवर्तन विरोधी कानून' (anti-conversion law) सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले कानूनी हथियारों में से एक बन गया है। सुप्रीम कोर्ट समेत अदालतों ने इस बात पर जोर दिया है कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन जबरन या धोखे से कराए गए धर्मांतरण को इसमें संरक्षण नहीं मिलता। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अपनी मर्जी से अपनाए गए धर्म और जबरन कराए गए धर्मांतरण के बीच फर्क करना, स्थानीय स्तर पर विवाद का विषय बन सकता है।

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