यह कहानी हमें बतलाती है कि ख्रीस्तीय मूल्य हमारे जीवन में कैसे कार्य करते है। हमें बस आवश्यकता है ईश्वर के वचन पर विश्वास करने की। मैंने कई बार यह वचन पढ़ा था कि "सत्य तुम्हें स्वतन्त्र बना देगा," मगर मैं हमेशा सोचता था कि सत्य हमें कैसे स्वतंत्र कर सकता है? हम तो पहले से ही स्वतंत्र है। अब हमें स्वतंत्रता की क्या ही ज़रूरत है। लेकिन मैं गलत था। हम सभी संवैधानिक रूप से तो अवश्य ही स्वतंत्र है, मगर हम बहुत सारी छोटी- छोटी चीज़ों के गुलाम है, या कई प्रकार के मानसिक और वैचारिक और शारीरिक रूप से बंधनों में बंधे हुए है। और इन बंधनों से हमें सिर्फ ईश्वर ही छुटकारा दिला सकते है। हमारे पास ईश्वर का वचन और ख्रीस्तीय मूल्य है। जो हमें ख्रीस्त के सच्चे अनुयायी बना सकते है। हमारे पास दैनिक जीवन में कई कैसे अवसर आते है, जब हमारे पास किसी कार्य को करने के कई विकल्प मौजूद होते है। तब हमें ख्रीस्तीय मूल्यों को ध्यान में रखकर सही कार्य को चुनना चाहिए। जिससे हम ख्रीस्त के सच्चे अनुयायी बन सकते है। "यदि तुम मेरी शिक्षा पर दृढ़ रहोगे, तो सचमुच मेरे शिष्य सिद्ध होगे। (संत योहन 8:31)