ख्रीस्तीय एकता और इसका लंबे समय तक चलने वाला प्रभाव

भारत से रोम तक, बोसी एक्यूमेनिकल इंस्टीट्यूट में पढ़ने वाला एक युवा ख्रीस्तीय एकता और न्याय के साथ-साथ इस टूटी हुई दुनिया में ख्रीस्तीय एकता का क्या मतलब है, इस पर विचार करता है।

रोम में, ख्रीस्तीय एकता के लिए प्रार्थना सप्ताह के दौरान, ख्रीस्तीय एकता रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाता है, और रोम शहर की सड़कें ख्रीस्तीय एकता को ज़िंदा करने के लिए सभी संप्रदाय के ख्रीस्तियों से भर जाती हैं।

इस सप्ताह रोम में उपस्थित लोगों में भारत के 29 साल के ख्रीस्तीय और पूर्वी कलीसिया के विश्वासी (बिलीवर्स ईस्टर्न चर्च) एबेल पुनूस भी हैं। वे कलीसियाओं के विश्व परिषद के बोसी इक्यूमेनिकल इंस्टीट्यूट के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य रुप में रोम आए हैं।

वाटिकन न्यूज़ को दिए एक साक्षात्कार में एबेल कहते हैं, “यह ख्रीस्तीय एकता के लिए प्रार्थना सप्ताह है।” “हम यहाँ यह समझने के लिए हैं कि हम कहाँ अलग हैं, लेकिन एकता के लिए जानबूझकर काम करने के लिए भी।”

बोसी सिर्फ़ एक शैक्षिक संस्थान नहीं है। एबेल बताते हैं कि यह एक ऐसी जगह है जहाँ रोज़ाना एकता को जिया जाता है। अलग-अलग परंपराओं और देशों के छात्र न सिर्फ़ क्लासरूम, बल्कि खाना, प्रार्थना और आम ज़िंदगी भी साझा करते हैं।

वे मानते हैं, “शुरुआत में, अंतर साफ़ दिखते हैं। लेकिन समय के साथ, आपको एहसास होता है कि आपमें जो चीज़ें आपको अलग करती हैं, उससे कहीं ज़्यादा बातें एक जैसी हैं।”

वे कहते हैं कि प्रार्थना, महत्वपूर्ण मोड़  बन जाती है। “आध्यात्मिक जीवन में एक साथ आना एकता को बढ़ावा देता है। यह कोई आसान सफ़र नहीं है—हमारे मुश्किल दिन भी आते हैं—लेकिन प्रतिबद्धता और सच्चे इरादे से, एकता को जीना मुमकिन हो जाता है।”

एक बंटा हुआ ख्रीस्तीय धर्म और एक बंटी हुई दुनिया
एबेल ज़ोर देकर कहते हैं कि ख्रीस्तीय एकता सिर्फ़ एक अंदरूनी चिंता नहीं है। इसके नतीजे उस दुनिया पर भी पड़ते हैं जिसकी कलीसिया सेवा करना चाहती है।

कलीसियाओं के विश्व परिषद के महासचिव, रेवरेंड प्रोफ़ेसर डॉ. जेरी पिल्ले को कोट करते हुए, एबेल उस कड़ी चेतावनी को याद करते हैं: "एक बंटा हुआ ख्रीस्तीय धर्म, एक बंटी हुई दुनिया से कुछ नहीं कह सकता।" राजनीति, जाति, विचारधारा और दूसरों के डर से टूटे हुए समाजों में, ख्रीस्तीय गवाही की विश्वसनीयता को रोज़ाना परखी जाती है।

वे आगे कहते हैं, "अगर हम कहते हैं कि हम ईश्वर के राज्य का हिस्सा हैं, तो हमें इसे अपनी ज़िंदगी से साफ़ तौर पर दिखाना होगा।" वे ज़ोर देते हैं कि लगातार अंदरूनी टकराव, कलीसिया की गवाही को कमज़ोर करता है। इसके विपरीत, एकता एक तरह की उद्घोषणा बन जाती है।

मानव स्वतंत्रता, दया और दुखियों के साथ एकजुटता, साझा प्राथमिकताएँ बनकर उभरती हैं। एबेल प्रवास, ज़ुल्म और आर्थिक मुश्किलों को ऐसे मुद्दों के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसी सच्चाइयों के तौर पर बताते हैं जिनके लिए एकजुट ख्रीस्तीयों को जवाब देने की ज़रूरत है।

वे कहते हैं, “दूसरों के खातिर अपने आराम को छोड़ना हमारे विश्वास की बुनियाद है।” “अलग-अलग संप्रदायों में, यहीं पर हम सच में एक साथ आ सकते हैं।”

भारतीय संदर्भ: एकता अंदर से शुरू होती है
एबेल के लिए, ये सवाल बहुत ही व्यक्तिगत हैं। वे बताते हैं कि भारत में ख्रीस्तीय धर्म, प्रेरित संत थॉमस के समय से है और इसका एक लंबा और जटिल इतिहास है, खासकर उनके गृह राज्य केरल में। फिर भी सदियों से मौजूद होने के बावजूद, ख्रीस्तीय एक छोटी अल्पसंख्यक आबादी ही है—और कलीसिया के अंदर भी बँटवारे बने हुए हैं।

वे कहते हैं, “ईसाई समुदायों के अंदर जातिवाद को देखना अभी भी दुख देता है। अगर हमने अपने अंदर हो रहे अन्याय को नहीं सुलझाया, तो हम दुनिया के लिए एक भरोसेमंद गवाह कैसे बन सकते हैं?”

साथ ही, वे भारत में शिक्षा, सामाजिक न्याय और गरीबी हटाने में कलीसिया के लंबे समय से जुड़े होने को स्वीकार करते हैं। बहुत कुछ किया गया है—लेकिन अभी भी बहुत कुछ बाकी है। वे ज़ोर देकर कहते हैं, “युवा लोगों को ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए।” “उन्हें पीड़ादायक जगहों पर जाना चाहिए और अपनी बात रखनी चाहिए।”

उपहारों का आपसी लेन-देन
बोसी में, एबेल को न सिर्फ़ इन मुश्किलों के बारे में बोलने की जगह मिली है, बल्कि उन्हें सुना भी गया है। वे कहते हैं कि ख्रीस्तीय एकता को, औपनिवेशिक इतिहास से बने पुराने असंतुलन से दूर होकर उत्तर और दक्षिण विश्व के बीच उपहारों के सच्चे लेन-देन की ओर बढ़ना चाहिए।

वे समझाते हैं, “दक्षिण विश्व को अक्सर सामान की मदद की ज़रूरत होती है, लेकिन हमारे पास भी देने के लिए बहुत कुछ है—हमारी आध्यात्मिकता, हमारी परंपराएँ, हमारी कहानियाँ।” उनका मानना ​​है कि सच्ची एकता सुनने से उतनी ही बढ़ती है जितनी देने से।

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