समाजशास्त्रीय नज़रिए से धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों की पड़ताल
मुंबई, 9 अगस्त, 2026: 'सोसाइटी ऑफ़ द डिवाइन वर्ड' द्वारा संचालित 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडियन कल्चर' (IIC) ने 8 अगस्त को "धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून: एक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण" विषय पर एक व्याख्यान आयोजित किया।
मुंबई में हुए इस कार्यक्रम में विद्वानों, धर्मगुरुओं, छात्रों और समुदाय के सदस्यों की भारी भीड़ जुटी, जो इस मुद्दे की अहमियत को दर्शाता है।
IIC के निदेशक, डिवाइन वर्ड फादर जॉन सिंगारायर ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए अहम सामाजिक मुद्दों पर बातचीत को बढ़ावा देने के संस्थान के मिशन पर ज़ोर दिया। सत्र का संचालन डिवाइन वर्ड फादर स्कारिया ने किया, जिन्होंने मुख्य वक्ता डिवाइन वर्ड फादर जोसेफ एम.टी. का परिचय कराया, जो मुंबई विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के फैकल्टी सदस्य हैं।
फादर जोसेफ ने भारत में धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों के ऐतिहासिक विकासक्रम पर चर्चा की और इस बात पर ज़ोर दिया कि धर्म-परिवर्तन केवल कानूनी या धार्मिक मामला नहीं है, बल्कि यह पहचान, जाति, संस्कृति और आज़ादी से गहराई से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने प्रतिभागियों से इस मुद्दे को समाजशास्त्रीय नज़रिए से देखने का आग्रह किया और विभिन्न समुदायों के बीच संबंधों और संवैधानिक अधिकारों पर इसके असर को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा, "धार्मिक परिवर्तन पहचान, जाति, संस्कृति, सत्ता और व्यक्तिगत आज़ादी के सवालों से जुड़ा हुआ है।" साथ ही, उन्होंने विविधतापूर्ण समाज में निष्पक्ष जांच और बातचीत की ज़रूरत पर बल दिया।
इसके बाद एक इंटरैक्टिव सत्र हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने कानूनी, सामाजिक और नैतिक पहलुओं पर सवाल उठाए। प्रो. जोसेफ ने स्पष्टता और व्यावहारिक उदाहरणों के साथ जवाब दिए, जिससे चर्चा और समृद्ध हुई।
इस कार्यक्रम ने विद्वता, बातचीत और सामाजिक सद्भाव के प्रति IIC की प्रतिबद्धता को फिर से दोहराया।
